भक्ती और प्रेम की पराकाष्ठा श्री सुदामा जी और द्वारिकाधीश की परम पवित्र निस्वार्थ मित्रता का वर्णनन सुन कर श्रोता हुए आत्म बिभोर।
इंडिया क्राइम न्यूज़
कोटा-बिलासपुर- ब्यास पीठ से आज श्रीमद भागवत कथा के अंतिम पड़ाव में स्वामी नारायण प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने भक्ति,ज्ञान बैराग्य प्रेम मित्रता की पराकाष्ठा श्री सुदामा जी और द्वारिकाधीश त्रिभवनपती श्री कृष्ण की मित्रता का हृदय स्पर्शी वर्णनन अपनी अमृतमयी बाणी से सुनाया। और कहा सभी प्राणियों में सभी जगह परमात्मा ब्याप्त है इनको सिर्फ प्रेम से ही जाना जा सकता है,बुलाया जा सकता है,देखा जा सकता है।
हरि ब्यापक सर्बत्र सामना-प्रेम ते प्रगट होहिं मैं जाना।
सुदामा जी और श्री कृष्ण की बचपन की मित्रता में कर्मबंद का भोग ऐसा आया कि सुदामा महान गरीव हो गए और श्री कृष्ण द्वारिकाधीश बन गए। अपने मित्र के पास सहायता मांगने द्वारिकापुरी जाते है।और द्वारपालों से सुदामा का नाम सुनते ही अन्तर्यामी भगवान रुक्मिनी जी को छोड़ कर अपने बाल शाखा से मिलने दौड़ पड़ते है, मित्र से गले मिलकर रोने लगते है। अपने सिंघासन में बैठा कर जमीन में बैठकर पैर धोते है।उनकी दशा देखकर मित्र के द्वारा लाये गए दो मुट्ठी चावल को खा लेते है और उनको दो लोको का राज्य दे देते है।अपने पूरी की तरह सुदामापुरी का निर्माण करा देते है।धन संपदा से परिपूर्ण कर देते है। और इतना दिया फिर भी सुदामा जी को कुछ पता नही चला,और न ही मांगना पड़ा।अपने प्रिय भक्तों की लाज भगवान ऐसे ही रखते है बिन मांगे ही सब कुछ दे देते है।
श्री कृष्ण ने सोलह हाजर एकसौ युवतियों को भौमासुर से युद्ध जीत कर मुक्त कराई और रुक्मिणी,जामवंती,कालिन्द्री,सहित आठ पटरानियों के साथ सभी से विवाह किया। जरासंध,शिशुपाल सहित बड़े पराक्रमी बलशाली राजाओं का बध किया। पांडवों,कौरवों के साथ राजसूय यज्ञ करवाया, वंही दुर्योधन महल में आते समय फर्स की चमक को पानी समझ कर चले और गिर गए। द्रोपदी ने ब्यग किया कि अंधे पिता का अंधा पुत्र बस यंही से बिवद बढ़ा कौरवों ने श्री कृष्ण के पाण्डवों को बटवारे में सिर्फ पाँच गांव देने की बात कही जिसको दुर्योधन ने अस्वीकार कर दिया और सुई की नोक के बराबर भी जमीन बिना युद्ध के नही देंगे कहा। जुवां में पांडव पत्नी सहित सब कुछ हार गए और यंही से महाभारत सुरू हो गई। सारे कौरव मारे गए पांडवों ने युद्ध जितने के बाद भी स्वर्गलोक की यात्रा पर हिमालय चले गए इधर भगवान श्री कृष्ण एक पेड़ के नीचे बिश्राम कर रहे थे बहेलिया ने पैर में तीर मारा और श्री कृष्ण अपने परमधाम बैकुंठ चले गए। इधर सारे यदुबंशी आपस मे लड़ कर मर गए।


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