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भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं के साथ.. 56 भोग लगाकर गोवर्धन गिरिराज की हुई पूजा..हरी से बड़ा .. श्री हरि का नाम....ब्यास स्वामी नारायण प्रपन्नाचार्य जी महराज।

मां रोहिणी जी, मां यशोदा जी,के लल्ला का नामकरण गर्गाचार्य जी ने ..राम बलभद्र, राम कृष्ण रखा।

 इंडिया क्राइम न्यूज़ 

कोटा-बिलासपुर- कोटा नगर  में हो रही श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करने दूर दूर से महिलाएं,पुरुष बड़ी संख्या में पहुँच रहे है।

कथा ब्यास परम श्रद्धेय स्वामी नारायण प्रपन्नाचार्य जी महाराज के मुखारबिंद से अमृतरसमयी कथा के पंचम दिवस में  माता यशोदा के लल्ला की बाल लीलाओं का बर्णनन किया गया।
माता यशोदा जी अपने लल्ला को गौमाता की पूंछ से झाड़ा लगाकर उनकी नजर उतार रही है। इसी समय पूतना नाम की राक्षसनी जिसको लल्ला के मामा कंस ने भेजा था।उसने गोपियों की भीड़ में यशोदा के लल्ला को उठा ले गई और अपना स्तनपान करा कर मारना चाहती थी परंतु यशोदा नंदन ने उसके स्तनपान कर प्राण हर लिए ,और परम धाम दिया। फिर कंस ने सकटा सुर और तृणावर्त नामक महा भयानक रक्षास भेजे लल्ला ने खेल खेल में इनके भी प्राण हर कर मोक्ष प्रदान किया।
बासुदेव जी ने आचार्य ऋषिवर गर्गाचार्य जी से अपने लल्ला का नामकरण करने के लिए निवेदन किया, और माता रोहिणी के पुत्र का नाम बल की अधिकता के कारण बलराम,बलभद्र,संकर्षण आदि नाम रखे, वंही माता यशोदा के लल्ला का नाम  साँवला होने के कारण सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला होने के कारण कृष्ण रखा, वासुदेव पुत्र होने के कारण वासुदेव भी कहलाये, और इस तरह से श्री कृष्ण के कई नाम रखे गए।

अपनी बाल लीलाओं में श्री कृष्ण ने अपने ग्वाल मित्रों के साथ माखन चोरी की मनमोहक लीलाएं की,गोपियों की मटकी फोड़ी,पनघट में गोपियों के साथ सरारतें भी की, माता यशोदा को मिट्टी खाने के बाद अपना मुख खोल कर अखिलब्रम्हाण्ड नायक का विराट स्वरूप दिखाया,और फिर माता का मोह भंग किया, माता यशोदा ने एक बार ऊखल से बांध दिया तब खेल ही खेल में फिर नल, कुबेर जैसे यक्षों का नारदमुनि के श्राप से मुक्त किया।

इसी बीच बाल लीलाओं के साथसाथ ही मामा कंस के द्वारा भेजे गये सभी महा अभीमानी,महान बलसाली,मायाबी- बतसासुर, अघासुर,बकासुर, जैसे राक्षसों को मारकर गोप गोपियों को भय से मुक्त किया।

फिर पूज्य श्री महराज जी ने कथा प्रसंग में श्रोताओं को बताया कि श्री कृष्ण ने बाललीलाओं के साथ ही अभिमानी अपने कर्म से विमुख इंद्र देव का अभिमान चूर करने की ठानी और बासुदेव जी से इंद्र की पूजा की बजाय गोवर्धन पर्वत की महत्ता बताते हुए उनकी पूजा करने की बात कही। और बाबा वसुदेव को इंद्र देव के भय एवम प्रकोप से रक्षा करने की बात कही। गोवर्धन गिरी  सभी गोप गोपियों और उनके धन धान्य की रक्षा करेंगे।
गोवर्धन गिरी की पूजा सभी गोप गोपियों ने 56 प्रकार के बयनजनों को बना कर भोग लगाया पूजा किया और 56 भोग के प्रसाद को सभी गोप गोपियों गायों, सखा मित्रों को बांट कर श्री कृष्ण ने खिला दिया।

इससे इंद्र नाराज हो गए पूरे ब्रज मंडल में अपने मेघो को भारी बारिश और तूफान करने का आदेश दिया फिर मूसलाधार बारिश हुई भयानक तूफान आने लगा बादल गरजने लगे, ब्रज मंडल में त्राहि त्राहि मच गई गोप गोपियां त्राहिमाम बोलने लगे तब श्री कृष्ण ने अपनी छिंगली उंगली से पूरे विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सभी को बोले इसके नीचे आ जाओ,पूरा ब्रजमंडल सहित गोप गोपियां,गौमाता,बैल बछड़े, खेत खलिहान सभी इस गोवर्धन के अंदर समा गए,इंद्र वर्षा कर कहर बरपा कर थक गया और उसको अपनी भूल का अहसास हुआ,इस तरह से भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र के घमंड को चूर किया।क्योंकि भगवान अपने भक्तों के अंहकार के पेड़ को बढ़ने नही देते हमेशा आपने भक्तों का कल्याण करते है।

कुछ इसी तरह का नजारा आज की भागवत कथा में गोवर्धन पूजा के समय देखने को मिला जमकर इंद्रदेव ने बादलों से गर्जना,वारिश अंधड़ करवाया
पंडाल और कोटा नगर कुछ देर के लिए जलमग्न होने लगा फिर श्री कृष्ण ने वही किया जो द्वापर में ब्रजमंडल में किया था गिरिराज को उठा लिया और भागवत कथा का आनंद उनके भक्तों ने गोवर्धन जी की पूजा आरती कर भागवत भगवान गोविंद की आरती कर जम कर उत्सव मनाया। और श्री कृष्ण गोवर्धन गिरिधारी नाम से भी पूजे जाने लगे।

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