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ध्यान से मिलती है संवेदनशीलता, और सृजनता---आचार्य दर्शन जी

ध्यान से मिलती है संवेदनशीलता, और सृजनता---आचार्य दर्शन जी
ध्यान से विकसित होती है प्रेम मयी ऊर्जा जो परम आनंद की प्राप्ती का बनती है श्रोत।

बिलासपुर---आज के इस ब्यस्ततम जीवन मे हर ब्यक्ति के लिए ध्यान एक संजीवनी बूटी से कम नही है।जो इंसान को ह्र्दयताल पर अजर अमर रखती है।
अपने एक प्रवचन में आचार्य प्रोफेसर प्रभाकर दर्शन जी ने बताया कि मनुष्य के जीवन मे परम अनन्द, परम सुख की अनुभूति तभी हो सकती है जब वह ब्यक्ति ध्यानी हो अर्थात ध्यान साधना करता हो।

आपने बताया कि ध्यान करने वाले मनुष्य में इन महान नौ गुणों का विकास अपने आप होने लगता है,
ध्यान से सम्बेदन शीलता बढ़ती, सृजनता, मौन, प्रज्ञा, करुणा, आनन्द प्रेम, मैत्रीभाव, अद्वतीयता, ये एक ध्यान साधक सन्यासी को सुगम सहज ही प्राप्त होते है।

आज पूरे बिस्व में अशांति का माहौल है, अणु और परमाणु बम, जैसे माह बिनासक हथियार है,जिसके प्रयोग से मानवता सभ्यता का विनाश हो जाएगा, आज के इस दौर में ध्यान रूपी ज्योतिर पुंज आलोक का सभी के जीवन मे होना अति आवश्यक है। क्योंकि ध्यानी ब्यक्ति या उसके सानिध्य में रहने वाले ब्यक्ति कभी विनाशक नही हो सकते वह सृजन करेंगे बिनास नही।

आगे आचार्यवर ने कहा प्रेम पूर्ण ब्यक्ति बिकाश करता है बिनाश के लिए सोचता भी नही, और प्रेम पूर्ण हृदय में तो स्वयं अस्तित्व गोबिंद प्रगट हो जाते है, तो वंहा सृजन के सिवा कुछ वचता ही नही,

करुणा मयी, प्रज्ञावान ब्यक्ति पूरे समाज को अपने रंग में रंग लेता है, उस ब्यक्ति में आनंद, प्रेम मैत्री, बसुधैव कुटुम्बकम, की भावना का सागर हिलोरे मारने लगता है,वह ब्यक्ति अद्वतीयता को प्राप्त होता है। आज इन गुणों की कमी आने से चारो ओर असंतोष दुःख महामारी के रूप में फैल रहा है, इनकी अचूक दवा है ध्यान इससे ये सभी गुण बिकसित हो जाते है जिसके फलस्वरूप संतोष सुख आनंद,प्राप्त होता है ।

प्रेम का मतलब संबंध नही है, प्रेम का मतलब है स्वभाव,प्रेम ही परमात्मा है गोविंद है,घृणा इर्षा से प्रेम का नाश होता है ध्यान से प्रेम प्रगाढ़ता को प्राप्त होता है।

ध्यान से ऊर्जा ऊपर हृदय चक्र यानी प्रेम चक्र की ओर बढ़ती है,यह प्रेम पूर्ण स्थिति है,और प्रेम पूर्ण ब्यक्ति दूसरे को भी प्रेम पूर्ण बना कर आनंदित करता है।

ध्यान करें अपने भीतर स्वयं को अंतर आकाश को देखे वँहा गूंज रहे ओंकार नाद को सुने,जगमगा रहे नूर को देखे सांसो को देखे और बिचार शून्य होकर समाधी में लीन हो जाये। फिर यंही से निरन्तर अभ्यास करने से  उपरोक्त गुणों का जन्म सुरु हो जाता है जो आपके जीवन मे परिवर्तन कर आपको बहुमूल्य बना देगे। आप आनंदित और प्रेम पूर्ण खजाने के मालिक बन जाओगे।

एकहि साधे सब सधै, सब साधे सब जय अर्थात इन गुणों को अलग अलग नही साधना है प्रति दिन ध्यान करने से ही सभी गुण अपने आप घटित होने लगते है।

आचार्य जी ने बताया कि घर को ही आश्रम जैसा बनायें, साधना केंद्र बना लें घर मे भगवान की फोटो लगी रहती है वह भी ध्यान में सहायक होती है, अच्छी तसबीरें भी ध्यान का माहौल बनाती है।

ध्यान समाधी में जाने की कई बिधियाँ है, उनमे से ब्रम्ह नाद ध्यान से प्रज्ञा बढ़ती है, ध्यान वह दिव्य इत्र है जो जीवन को सुगंध से भर देता है।
ॐ सद्गुरवे नमः
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