गजेंद्र मोक्ष, इंद्र को ऋषि का श्राप,समुद्र मंथन, श्री राम जन्म,श्री कृष्ण जन्मोत्सव की कथा श्रवण का आनंद श्रोताओं ने पान किया।
इंडिया क्राइम न्यूज़
कोटा-बिलासपुर- कोटा में सार्वजनिक संगीतमयी भागवत कथा पितृ पक्ष में आज अपने चतुर्थ दिवस की कथा के पड़ाव पर पहुँच गई है।
ब्यास पीठ से परमश्रद्धेय ब्रम्ह तत्व के मर्मग्य स्वामी नारायण प्रपन्नाचार्य जी महाराज श्रीमद्भागवत की मोक्ष दायनी कथा का श्रवण भक्तों,श्रोताओं को करा रहे है।
आज कथा के चतुर्थ दिवस में भागवत भगवान श्री हरि लक्ष्मी नारायण के महत्वों का बर्णन किया गजेंद्र मोक्ष कथा में ग्राह और गज की कथा का श्रवण कराया, कैसे त्रिकुट पर्वत की तलहटी में वनी सरोवर में ग्राह यानी मगर ने गज के पैर को पकड़ लिया, कई हजारों वर्ष तक लड़ाई चली जब गज हारने लगे थक गए तो उनके सभी सगे, संबंधी,पत्नी छोड़ कर जाने लगे। तब गज को चतुर्भुज रूप वाले श्री नारायण याद आने लगे उसने स्तुति की और गरुड सवार श्री हरि नारायण सरोवर में कूद कर गज को ग्राह सहित बाहर निकाला और चक्रसुदर्शन से ग्राह को परम धाम दिया गज को मोक्ष प्रदान किया। इसलिए मनुष्य या प्राणी को बिपत्ति में ही नही बल्कि सुख और अच्छे समय मे भी चार भुजाओं वाले श्री हरि के स्मरण में जीना चाहिए। तब आपको हारना नही पड़ेगा हमेशा आपको यश मिलता रहेगा।
इसके बाद कथा में इंद्र का अभिमान ऋषि का भाव सहित सम्मान न करने का दुष्परिणाम ऋषि के शाप से मिला और इंद्र देव श्री हीन हो गए। तब असुरों ने इंद्रलोक पर आक्रमण कर देवलोक को अपने अधीन कर लिया और सारी संपदा श्री लक्ष्मी समुद्र में श्री हरि की कृपा से समा गई। तब श्री हरि विष्णु जी ने देवताओं को पूना बैभवसाली बनाने के लिए समुद्र मंथन की सलाह दी।
देवताओं और असुरों ने मिलकर मन्दराचल पर्वत की मथानी बना कर वासुकी नाग की रस्सी बनाई और स्वयं श्री हरि विष्णु जी ने अपने पृष्ठ भाग में मंदरा चल पर्वत को धारण किया तब समुद्र मंथन हुआ, पहले कालकूट हलाहल विष निकला जिसको स्वयं शंकर जी ने पान किया और नीलकंठ भगवान कहलाये, अचैश्रवा अश्व निकला, जिसको राजा बली ने रखा, ऐरावत हांथी निकला जिसको इंद्र ने रखा, लक्ष्मी जी मंथन से निकली जिन्होंने श्री हरि बिष्नु जी का वरण किया, फिर अमृत कलश निकला जिसको संघर्ष के बाद श्री विष्णु जी की कृपा से देवताओं को प्राप्त हुआ।
कथा प्रसंग के नौवे स्कंध में श्री राम जी के जन्म का बर्णन किया स्तुति की गई और फिर दसवें स्कंध में श्री कृष्ण जी का जन्म माता देवकी वासुदेव जी के गर्भ से मामा कंश के कारागार में हुआ फिर बासुदेव जी ने गोकुल में नंद बाबा जी के यंहा यमुना जी को पार कर अर्धरात्री में पहुचाया और योगमाया रूपी पुत्री के लेकर आ गए।
भगवान श्री कृष्ण जी का जन्मोत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया गया माखन मिश्री लड्डुओं फलों का प्रसाद वितरण कर श्रोताओं ने खूब उत्सव मनाया, भागवत पंडाल में श्रोताओं की भीड़ उमड़ रही थी, जय श्री राधे।


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