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*बुराई पर अच्छाई की विजय,दानवता पर मानवता की विजय, के प्रतीक स्वरूप, रावण दहन के साथ मनाई गई विजयादशमी।*

*बुराई पर अच्छाई की विजय,दानवता पर मानवता की विजय, के प्रतीक स्वरूप, रावण दहन के साथ मनाई गई विजयादशमी।*

*राक्षसत्व पर सनातन सत्य की विजय का प्रतीक है दशहरा।*

*इंडिया क्राइम न्यूज़*

*बिलासपुर--  चैत मास में शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयादशमी के रूप में भारत मे मनाने की परम्परा सदियों  से चली आ रही है। धर्मग्रंथों के अनुसार खास तौर पर रामायण के अनुसार त्रेता युग मे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम ,लक्ष्मण भरत, शत्रुघन,हुए थे।*

*इधर उत्तम कुल में जन्मे पुलस्त ऋषि के नाती, विसेश्वरवा के पुत्र रावण, कुंभकरण,बिभीषण हुए थे।जो महान पराक्रमी, बीर योद्धा थे। रावण ने मय दानव की पुत्री मंदोदरी से विवाह करके  सोने की लंका में निवास करने लगे और अपने पराक्रम के बल पर राक्षसों के राजा बन गए। भगवान शंकर की कठिन तपस्या करके  उनको प्रसन्न करने के लिए दस बार अपने शिर को काट काट कर चढ़ा दिए तभी से दशानन,दशकंधर कहलाने लगे। तीनो लोको को जीत कर अपने बस में कर लिए, काल को भी जीत लिया,इंद्र कुबेर को जीत कर पुष्पक विवान भी हासिल कर लिया, रावण के क्रोध से चलने से धरती डगमगाती थी, ऐसा महान अद्वतीय योद्धा दुष्कर्मो के कारण पतन को प्राप्त हुआ।*

*राम जो स्वयं परमब्रम्ह है उनकी पत्नी स्वयम जगदम्बा स्वरूपा माता सीता का छल से हरण कर के लंका ले जाना, और ऋषियों, मुनियों से खून का कर लेना, हवन पूजन न करने देना, धर्म का समूल नाश करने का प्रयास करना, सनातन धर्म के प्रतिकूल आचरण करना, ऐसे ही दुष्कर्म के फलस्वरूप रावण को राम के हाथों मरना पड़ा राम को रावण का बध करना पड़ा।*

*क्योकि राम का जन्म ही असुरों को मारकर धर्म संस्कृति और देवताओं की रक्षा के लिए गाय ब्राह्मण संतों की सुरक्षा के लिए ही हुवा था।*

*राम मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप में अवतरित हुए थे इस लिए उनका शुत्र था, की ... "अनुज बधू भगनी सुत नारी, ए  सठ सब कन्या सम चारी।  इन्है कु दृष्टि बिलोकई जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई।।*

*और महा बलसाली- बाली और रावण दोनों ने इस शूत्र को तोड़ा इस लिए सभी अधर्म युक्त कार्यो के फलस्वरूप राम ने रावण का बध किया लंका का राजा धर्मब्रत धारी रावण के भाई बिभीषण को बनाया और सीता जी को लेकर अयोध्या धाम वापस हुए तभी अयोध्या में बड़े धूम धाम से विजय दशमी मनाई गई।*

*आज भी वही परम्परा रावण दहन के बाद विजय दशमी दसहरा का उत्सव एक दूसरे से गले मिलकर ,पान खिलाकर, सोन पत्ता देकर  बड़े उल्लास के साथ मानते है।*

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